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दहेज़ एक अभिशाप है

  • 24/12/2014
    संवाद्दाता -राजेश तिवारी आपको समाज में लोगों के अन्दर विवाह को लेकर बहुत ज्यादा उत्साह और जोश देखने को मिलता हर कोई चाहे उसका स्वयं का विवाह हो या फिर उसके पुत्र या फिर पुत्री का किस का हैं इस बात से कोई फर्क नही पड़ता .....
    पुराने समय की बात करें तो हिन्दू समाज में विवाह के लिए लड़कियों (कन्याओं) को स्वयं अपना वर चुनने का अधिकार उनके माता-पिता तथा समाज ने दे रखा था, विवाह के अवसर पर समय आने पर समाज में सामूहिक रूप से यह घोषणा करवा दी जाती थी की इस दिन इस कन्या का स्वयंवर हैं उसके अन्दर कोई भी ब्यक्ति भाग ले सकता था और शर्त के अनुसार वह या फिर कन्या के द्वारा वरण किये जाने पर उसका विवाह संपन्न माना जाता था ....
    और उसके बाद पिता अपनी पुत्री को अपनी ख़ुशी और श्रधा अनुसार जो कुछ भी देना चाहते थे वह देते थे और अगर नहीं देना चाहते थे तो उनसे वर पक्ष किसी भी चीज की कोई मांग नहीं रखते थे और न ही कन्या अपने माता-पिता से किसी भी प्रकार के धन या वैभव की आशा रखती थी, लेकिन आज ........
    लेकिन आज हमारे समाज में इस "दहेज़" नामक कुप्रथा ने अपने पैर इस कदर फैला लिए हैं की इससे निपटपाना बड़ा मुश्किल हो गया हैं, आज यह कुप्रथा पूरी तरह से हमारे समाज के हर वर्ग के लोगों की नशों में खून की तरह से फ़ैल चुकी हैं, इसके बगैर तो ऐसा लगता हैं कि विवाह अधूरा रह गया, शादी में सम्मिलित हुए हर एक बाराती की नजर या तो कन्या पक्ष की लड़कियों को तलाशती हैं या फिर दहेज़ में दिए जाने वाले सामान को, यह एक तरह से आदत बन चुकी हैं एक सोच बन चुकी हैं कि बिना दहेज़ के विवाह नहीं संभव ही नहीं है
    अगर आप शादी में दहेज़ न देने की बात करो तो लोगों का कहना होता हैं की फिर तो हो गयी शादी ! अगर उन्हें बताओ कि भाई एक ब्यक्ति ने बिना दहेज़ लिए विवाह किया हैं तो लोगों का जवाब होता हैं की लड़के की शादी किसी के साथ नहीं हो रही होगी इसलिए उसने मजबूरी में विवाह किया होगा ठीक इसीतरह से अगर आप यह कहो कि मैंने ऐसी लड़की का विवाह देखा हैं जिसमें कन्या पक्ष ने बिना दहेज़ के शादी की हैं तो भी लोग यही कहते हैं की लड़के में कोई कमी होगी या फिर यह प्रेम विवाह होगा इसीलिए उसने बिना दहेज़ के शादी की हैं अगर सब कुछ ठीक होता तो शायद वह कभी भी शादी बिना दहेज़ के नहीं करता...... इस सोच को बदलना होगा और इसकी शुरुआत लेने वाले कभी नहीं करेंगे इसकी शुरुआत देने वालों यानि की कन्यापक्ष को करनी पड़ेगी, आप अपनी बेटी का विवाह कर रहे हैं न कि व्यापार, विवाह दो आत्माओं का मिलन होना चाहिए न की दो शरीरों का, विवाह का आधार प्रेम होना चाहिए न की एक ब्यवस्था का आधार
    आप अपनी बेटे का विवाह करिए उसे बेचिए नहीं और लड़की पक्ष भी अपनी बेटी का विवाह करिए न की उसके लिए वर खरीदिये, आपकी बेटी या फिर बेटा एक सजीव प्राणी हैं न कि कोई वस्तु .
    मुझे लगता हैं की हमारे देश में लगातार बढ़ रहे अपराधों की जड़ कहीं न कहीं यही हैं
    गौर करिए इस पर ........अपनी सलाह और विचार व्यक्त करिए समाज के सामने
    ......कोमल भारद्वाज ....... ।

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